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Friday 9 May, 2008
 06:50 | 7/Jan/2008 |  0 Comment(s)
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बलिया से चंद्रशेखर के बेटे की जीत के मायने

आजीवन बलिया से सांसद रहे चंद्रशेखर की मृत्यु के बाद बलिया की जनता ने उनके बेटे को सांसद बना दिया। अब उत्तर प्रदेश की एक लोकसभा सीट के उपचुनाव के नतीजे आए तो, राजनीतिक विश्लेषक और पार्टियों इस जीत के राजनीतिक मायने निकालने में जुट गए हैं। लेकिन, अगर ईमानदारी से इस चुनाव के नतीजे को देखें तो, इसके मायने देश की राजनीति के युवा तर्क को बलिया की जनती अंतिम श्रद्धांजलि से ज्यादा ये कुछ नहीं है।

मेरे ऐसा कहने की पीछे खास वजह भी है। चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर समाजवादी पार्टी के टिकट से सांसद चुने गए हैं, इसलिए स्वाभाविक है कि सपा इसका जोर-शोर से हल्ला करेगी और इसे राज्य में आने वाले लोकसभा चुनाव के राजनीतिक रुझान के तौर पर बताएगी। उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकार आने के बाद से मांद में छिप गए सपा के कार्यकर्ता-नेता बलिया जीतने के बाद चौराहों, बैठकों पर फिर से लोहिया के आधुनिक चेले मुलायम को धरती पुत्र बताने लगे हैं।

लेकिन, क्या बलिया सपा ने जीता है। एकदम नहीं। बलिया की लोकसभा सीट बलिया वालों ने चंद्रशेखर को पैतृक संपत्ति जैसा बनाकर दे दिया था। अब पैतृक संपत्ति थी तो, स्वाभाविक है कि बेटे को इसे विरासत में मिलना ही था। समाजवादी पार्टी ने तो, बस मौके की नजाकत भांपकर नीरज शेखर को साइकिल पर बिठा दिया। बलिया को स्वर्गीय चंद्रशेखर की पैतृक संपत्ति मैं इसलिए कह रहा हूं कि बलिया जाने पर कहीं से भी ये अहसास नहीं होता कि ये भारतीय राजनीति के एक सबसे ताकतवर नेता की आजीवन लोकसभा सीट रही है।

विकास बलिया में रहने वालों को टीवी चैनल या फिर अखबारों की खबरों के जरिए ही पता है। या फिर जो, दिल्ली में चंद्रशेखर के बंगले जाते थे उन्होंने, ही देखा-जाना है। लेकिन, फिर भी चंद्रशेखर जिंदा रहते (और शायद अब भी) बलिया में चंद्रशेखर फोबिया ऐसा था कि बलिया से विधानसभा चुनाव जीतने वाले भाजपा के कई विधायक, मंत्री भी लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर के पक्ष में ही चीखते नजर आते थे।
यहां रहने वालों को चंद्रशेखर ने विकास के नशे से इतना दूर रखा कि लोग उन्हें सिर्फ चंद्रशेखर होने के नाम से ही सारी जिंदगी जिताते रहे। बलिया में विकास न करने के लिए चंद्रशेखर से बड़ा कुतर्क शायद ही कोई दे सके। चार महीने के लिए इस देश के प्रधानमंत्री रहे चंद्रशेखर कहते थे- मैं देश का नेता हूं। मुझे देश की तरक्की करनी है, देश तरक्की करेगा तो, बलिया भी विकसित हो जाएगा। चंद्रशेखर अब हमारे बीच नहीं रहे। लेकिन, चंद्रशेखर की इस बात पर बहस होनी इसलिए जरूरी है कि कोई नेता जिस लोकसभा सीट से चुनकर संसद मे पहुंचता हो, वहां के विकास पर ऐसे अजीब कुतर्क कैसे गढ़ सकता है।

लेकिन, बलिया के लोग शायद ऐसे ही हैं। बस चंद्रशेखर ने उनकी नब्ज पकड़कर उसी हिसाब से उन्हें उन्हीं की अच्छी लगने वाली भाषा में उसी बात को उनके दिमाग में बसा दिया कि वो देश में सबसे अलग और कुछ श्रेष्ठ हैं। बलिया के लोगों को मैं अपनी पढ़ाई के दौरान इलाहाबाद में बड़े ठसके से ये नारा लगाते सुनता था कि ‘अदर जिला इज जिल्ली, बलिया इज नेशन’। बागी बलिया कहकर वो खुश हो लेते हैं। देश से दस दिन पहले बलिया आजाद हुआ था, बस इतने से ही खुश हो लेते हैं। इस आत्ममुग्धता के शिकार बलिया वालों को पता ही नहीं लगा कि कब वो देश की मुख्य धारा से पूरी तरह से अलग हो गए हैं। यहां तक कि बलिया वालों को बगल के मऊ को देखकर भी शर्म नहीं आती लिया जो, कल्पनाथ राय के सांसद रहते हुए तहसील से चमकता हुआ जिला बन गया था।

खैर, चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर बलिया से जीतकर लोकसभा में यानी दिल्ली पहुंच गए हैं। वैसे बलिया के लोगों को पता नहीं कैसे ये भ्रम हो रहा है कि चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को उन्होंने बलिया से दिल्ली पहुंचा दिया। चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर तो पहले से ही दिल्ली में थे। और, ऐसे दिल्ली में थे कि इस लोकसभा चुनाव से पहले मुश्किल से ही बलिया के लोग चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को पहचानते थे। यही वजह थी कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी बलिया में चंद्रशेखर के ही बेटे को बाहरी बताने का दुस्साहस कर रही थी। लेकिन, ब्राह्मण स्वाभिमान के तथाकथित, स्वयंभू प्रतीक हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी पर दांव लगाना बसपा के काम नहीं आया। चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को 2,95,000 वोट मिले जबकि, हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर को 1,64,000 यानी लड़ाई में बहुत फासला था। कुल मिलाकर चंद्रशेखर का बेटा चंद्रेशखर से भी ज्यादा वोटों से जीतकर संसद पहुंच गया।

कांग्रेस की तो वैसे भी उत्तर प्रदेश में कोई गिनती है नहीं तो, फिर बलिया में अचानक होने की कोई वजह भी नहीं थी। लेकिन, यहां बीजेपी की जो दुर्गति हुई वो, देखने लायक है। भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता और एक जमाने में चंद्रशेखर के ही प्रिय शिष्यों में गिने जाने वाले वीरेंद्र सिंह को सिर्फ 22,000 वोट मिले। यानी साफ है कि फिलहाल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों के समय वाले ही हालात हैं। सीधी लड़ाई बसपा और सपा के बीच ही है।

यही समीकरण 2009 के लोकसभा चुनाव तक भी बना हुआ दिख रहा है। और, अगर यही रहा तो, 2009 में भाजपा की ओर से ‘PM in Waiting’ लाल कृष्ण आडवाणी 2009 लोकसभा चुनाव के बाद ‘Ex PM in Waiting’ हो जाएंगे। बलिया लोकसभा उपचुनाव के नतीजे का संदेश मुझे तो साफ दिख रहा है। आप लोगों की क्या राय है बताइए।

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